अगर आपको पूछना है तो पूछिए इनसे कि वो
सीआरपीएफ जिसके लिए आज ये घड़ियाली आंसू बहा रहे
हैं, चीख पुकार कर रहे हैं इनकी सुध पिछली बार कब ली थी। बीती 13 दिसंबर
को यही सीआरपीएफ वाले अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आए
थे, वो चाहते थे उन्हें ‘सैनिक’ का दर्जा दिया जाए, उन्हें पेंशन मिले। याद कीजिए उस दिन टीवी पर क्या चल रहा था,
क्या एक भी न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर
वहां पहुंचा था, कोई विजुअल याद
है आपको,
गुजरात, केरला और ओडिशा और देश के तमाम हिस्सों से आए
उन सीआरपीएफ के जवानों
की एक बाइट भी सुनी आपने… नहीं। इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया सिर्फ शहीद जवानों के जनाज़े की वीडियो के पीछे फिल्मी गाने लगाकर आपको भावुक कर देना चाहता है, ताकि आप कोई
सवाल न पूछें। आप भूल जाएं कि जो हुआ है उसके लिए सवाल
किससे पूछना चाहिए। आप को बरगला दिया गया है कि ये
गर्व का मौका है। किस
बात का गर्व करें, इस बात का? कि कई माओं ने
अपने बच्चे खो दिये, कई औरतें विधवा हो
गईं, बूढ़े बाप का सहारा छिन गया। ये गर्व का मौका नहीं अफ़सोस का मौका है, हमारी एजेंसियों और सरकार से चूक हुई
है। उनके हाथ 44 जवानों के खून से रंगे हुए हैं।

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