प्रिय दोस्तों, मैं आज आपको तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस की कुछ ऐसी चौपाइयो की गहराई से अवगत करना चाहता हूँ, जिसका समाज में ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है.
समाज के कुछ लोग “नारी” की छवि को धूमिल करने के लिए रामचरितमानस की कुछ ऐसी चौपाइयो का प्रयोग करतें हैं, जिसकी सच्चाई जाने बिना “नारी” के बारे में उनका उपयोग अपनी मूर्खता दिखना ही कहलाया जाएगा.
समाज के कुछ लोग “नारी” की छवि को धूमिल करने के लिए रामचरितमानस की कुछ ऐसी चौपाइयो का प्रयोग करतें हैं, जिसकी सच्चाई जाने बिना “नारी” के बारे में उनका उपयोग अपनी मूर्खता दिखना ही कहलाया जाएगा.
सबसे पहले बात आती है. सुंदरकांड की चौपाई की जो 58वें दोहे के बाद आती है.
ढोल गँवार शूद्र पशु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||
कुछ लोग इस चौपाई का इस्तेमाल रामचरितमानस और तुलसीदास जी पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए करते हैं. कुछ महिलाएँ भी लगभग यही सोचती हैं की तुलसीदास जी ने इस चौपाई को क्यों लिखा.
तो जानिए इस चौपाई की सच्चाई.
तो जानिए इस चौपाई की सच्चाई.
ये चौपाई सुंदरकांड में उस समय आती है जब “राम जी” का “समुद्र” के साथ संवाद चल रहा था.
उस समय जड़ “समुद्र” भगवान राम जी के सामने भयभीत होकर कहता है.
उस समय जड़ “समुद्र” भगवान राम जी के सामने भयभीत होकर कहता है.
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे | छ्महु नाथ सब अवगुण मेरे.
गगन समीर अनल जल धरणी | इन्ह की नाथ सहज जड़ करनी.
तव प्रेरित माया उपजाए | सृष्टि हेतु सब ग्रंथनी गाए.
प्रभु आयसु जेहि कहं जस अहई | सो तेहि भाँति रहें सुख लहई ||
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दिन्ही | मरजादा पुनि तुम्हरी किन्ही ||
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई | उतरीहि कटकु न मोरि बड़ाई ||
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई | अरौं सो बेगी जो तुम्हहि सोहाइ ||
गगन समीर अनल जल धरणी | इन्ह की नाथ सहज जड़ करनी.
तव प्रेरित माया उपजाए | सृष्टि हेतु सब ग्रंथनी गाए.
प्रभु आयसु जेहि कहं जस अहई | सो तेहि भाँति रहें सुख लहई ||
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दिन्ही | मरजादा पुनि तुम्हरी किन्ही ||
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई | उतरीहि कटकु न मोरि बड़ाई ||
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई | अरौं सो बेगी जो तुम्हहि सोहाइ ||
यहाँ पर ये बात साफ तौर पर पता चलती है की ये बात तुलसीदास ने लिखी ज़रूर लेकिन ये संवाद थे जो “समुद्र” और “राम जी” के बीच था, ऐसी मानसिकता समुद्र की थी. तुलसीदास जी की नही.
यहाँ पर जो ढोल गँवार शूद्र पशु और नारी के लिए वचन कहे गये है. ये समुद्र की मानसिकता को प्रदर्शित करती है. इसी समुद्र के अहंकार के कारण भगवान राम को तीसरे दिन धनुष उठाना पड़ गया था.
यहाँ पर जो ढोल गँवार शूद्र पशु और नारी के लिए वचन कहे गये है. ये समुद्र की मानसिकता को प्रदर्शित करती है. इसी समुद्र के अहंकार के कारण भगवान राम को तीसरे दिन धनुष उठाना पड़ गया था.
इसके बाद बात आती है अरण्य कांड की एक चौपाई की जो 34वें श्लोक के बाद आती है.
अधम ते अधम अधम अति नारी | तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी ||
कुछ लोग इस चौपाई का इस्तेमाल भी “भागवतदास जी“ के उपर प्रश्न चिन्ह लगाने के लिए करतें है. तो आइए इस चौपाई की गहराई भी जाने.
ये चौपाई अरण्य कांड में उस समय आती है जब “शबरी” “राम जी” के सामने हाथ जोड़कर कहती है की………..
पानि जोरि आगें भई ठाढी | प्रभुही बिलोकी प्रीति अति बाढ़ि ||
केहि बिधि अस्तुति करूँ तुम्हारी | अधम जाती मैं जड़मति भारी ||
अधम ते अधम अधम अति नारी | तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारि ||
कह रघुपति सुनू भामिनी बाता | मानाउँ एक भागति कर नाता ||
ज़ाती पँति कुल धर्म बड़ाई | धन बल परिजन गुण चतुराई ||
भगति हीन नर सोहइ कैसा | बिनु जल बरिद देखिअ जैसा ||
नावधा भागती कहउँ तोहि पाहि | सावधान सुनू धरू मन माही ||
केहि बिधि अस्तुति करूँ तुम्हारी | अधम जाती मैं जड़मति भारी ||
अधम ते अधम अधम अति नारी | तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारि ||
कह रघुपति सुनू भामिनी बाता | मानाउँ एक भागति कर नाता ||
ज़ाती पँति कुल धर्म बड़ाई | धन बल परिजन गुण चतुराई ||
भगति हीन नर सोहइ कैसा | बिनु जल बरिद देखिअ जैसा ||
नावधा भागती कहउँ तोहि पाहि | सावधान सुनू धरू मन माही ||
यहाँ पर भी ये बात “शबरी” द्वारा कही ज़ाती है. और ये कहते ही भगवान राम जी “शबरी” से कहते हैं. की हे – भामिनी. मेरी बात सुन. मैं तो केवल एक भक्ती ही का संबंध मानता हूँ.
ज़ाती, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता – इन सबके होनेपर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है. वैसे ही जैसे जलहिन बादल.
ज़ाती, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता – इन सबके होनेपर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है. वैसे ही जैसे जलहिन बादल.
देखिए ये सभी बातें संवाद के अंदर लिखी गई हैं. इनको गहराई से जानना आवश्यक है.
तुलसीदास जी “नारी” के बारे में क्या कहते हैं वो देखिए…..बाल कांड के प्रारंभ में ही तुलसीदास जी सीता (नारी शक्ति) के बारे में कहते है.
तुलसीदास जी “नारी” के बारे में क्या कहते हैं वो देखिए…..बाल कांड के प्रारंभ में ही तुलसीदास जी सीता (नारी शक्ति) के बारे में कहते है.
उद्भवस्थितिसंहारकारिणी क्लेशहरिणीम् |
सर्वश्रेयस्कारीं सीता नतोऽहं रामवल्लभाम् ||
व्याख्या – उत्पत्ति, स्थिति(पालन) और संहार करनेवाली, क्लेशों की हरनेवाली तथा संपूर्ण कल्यानो को करनेवाली श्री रामचंद्रजी की प्रियतमा श्री सीताजीको मैं नमस्कार करता हूँ.
सर्वश्रेयस्कारीं सीता नतोऽहं रामवल्लभाम् ||
व्याख्या – उत्पत्ति, स्थिति(पालन) और संहार करनेवाली, क्लेशों की हरनेवाली तथा संपूर्ण कल्यानो को करनेवाली श्री रामचंद्रजी की प्रियतमा श्री सीताजीको मैं नमस्कार करता हूँ.
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